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डिझाईन

सच तो यह है की डिझाईनींग एक सायन्स है। पीछले देढसो साल से ईसकी रिसर्च हो रही है। नए एक्स्परीमेन्ट्स हो रहे है। लेकिन चूंकी हम टोटली बिसनेस ओरीएन्टेड है, हमे ईससे कुछ लेना देना नहि होता। हम चाहते है की डिझाईनींग हमारे बिझनस को बढ़ावा दे, बस। ईसलिये हम एक्स्परीमेन्ट का रीस्क कम ही लेतें है। ज्यादातर एक्परीमेन्ट जो भारतमें होते है उसे विदेशी कंपनी ही करती है।

अब देखते है कि डिझाईन क्या है। ये रही सबकी फेवरेट ऐशवर्या राय।
सोचीये अगर उसकी आंखे, होठ अगर सही ढंग से सही जगह पर न लगे हुए होते...
तो वो कुछ ऐसी दीखती! ईसी प्रकार अगर डिझाईन के एलिमेन्ट्स अगर गलत प्रोपोर्शन, गलत जगह लगाए जाए तो पुरा डिझाईन बेहुदा बन जाता है। हाला कि ऐशवर्या की खुबसुरती तो सभी पहेचान जायेंगी लेकिन डिझाईन के बारे मे कोई ईतना नहि सोचेगा! सभी अपने अपने हिसाब से अपनी पसंद की डिझाईन बनवा लेंगे।

बेलेन्स, कोन्ट्रास्ट, हार्मनी, प्रोपोर्शन, प्लेसमेन्ट आदि ग्राफिक डिझाईन के रुल्स को जोड कर कर सही कोन्सेप्ट/डिझाईन तैयार किया जाता है। अगर डिझाईन फिर भी काम नहि करता तो यही रुल्स को उल्टा कर के तोड के काम किया जाता है।

डिझाईन खुबसुरत और ध्यान केन्द्रीत करनेवाला तो होना ही चाहिए, लेकिन डिझाईन अपना काम करे ये ज्यादा ज़रुरी है, वरना क्लायन्ट वापस डिझाईनर को ही बोलने आते है कि आपका डिझाईन काम नहि कर रहा, हमने तो सिर्फ कहा था की हमे यह-वो चाहिए लेकिन डिझाईन तो आपको ही बनाना था न? डिझाईन वो है जो काम करे, ना कि सुंदरता का प्रदर्शन।

डिझाईन काम कर रहा है या नहि यह जानने के लिये क्लायन्ट को चाहिए की वह सारा जरूरी डॅटा डिझाईनर को बताएं। आपके कोम्पेटीटर, टार्गेट ओडियन्स के बारे में साफ जानकारी दें। मार्केटमें सर्वे करतें रहे की नये डिझाईन के आने के बाद आपको फायदा हो रहा है या नहि। ताकी डिझाईन का एनालिसीस कर के अगले डिझाईनमें जरूरी फेरबदल किया जाए।

फिर से कहेना चाहूंगा कि डिझाईनींग एक सायन्स है। अगर सही रुल को एप्लाय किया जाए तो डिझाईन काम करता ही है।

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